Tuesday, January 12, 2010
Saturday, November 21, 2009
बच्चों को सोने के बाद पढ़ाएं- विजय प्रकाश
२० सितम्बर २००९ को जैन स्कूल,आरा में bal महोत्सव का पहला चरण शुरू हुआ जिसमे सामान्य ज्ञान,कहानी लेखन ,चित्र कला तथा कार्टून की प्रतियोगिताएं थी.इस चरण में लगभग पुरे बिहार से ३५०० बच्चों ने भाग लिया .इस माहौल को देखकर बिहार के प्रधान सचिव श्री विजय प्रकाश बहुत ही प्रभावित हुए। विशिष्ट अतिथि डॉ मृदुला प्रकाश खुशी से झूम उठी थी ,वे अपनी भावनाओं को बड़ी ही मुश्किल से संभल पायीं.आई ए एस मिप्रकाश ने बच्चों ,शिक्षकों,माता-पिताओं को बताया की अपने बच्चों को सपनों में पढ़ाएं .यदि विज्ञानं ए मैथ का कोई प्रश्न हल नही हो रहा हो तो उसे बनते-बनते सो जाओ ,सुबह उठोगे तो तुम उस समस्या को ख़ुद ही हल कर लोगे क्योंकि दिमाग रात भर जगा रहता है औरअपना कामकरता रहता है। यह गप नहीं सच है.बेंजीन की संरचना के आविष्कारक को संरचना की जानकारी सपने में ही मिली थी.वे बेंजीन के बारे में सोचते -सोचते सो गए । सपना देखा की एक सांप अपनी पूंछ अपने मुंह में दबाये हुए है .जगाने पर उन्हें यह अजीब लगा ,उन्होंने सोचना शुरू कर दियाऔर निष्कर्ष निकला की यही बेंजीन की संरचना है जिसकी शुरुआत और अंत एक ही जगह पर होता है .श्री प्रकाश के अनुसार यदि बच्चा सो गया है तो ज्ञान की बातें बताते रहे ,एक महीने बाद पाएंगे की वो बच्चा उस विषय में निपुण हो गया है .
Thursday, November 19, 2009
यवनिका ने आयोजित किया छठा बाल महोत्सव
yawanika sanstha ने छठा राज्य स्तरीय बाल महोत्सव १२ नवम्बर से १५ नवम्बर ,०९ तक वीर कुंवर सिंह मैदान आराबिहार में आयोजित किया जिसमे देशको की संख्या लाखो में रही . ज्ञात हो की यह आयोजन तीन चरणों में संपन्न हुआ । इस महोत्सव में लगभग सातहज़ार बच्चें गाँव व् शहर से भाग लिए । नृत्य,नाटक,गाना ,चित्रकला,कार्टून,कहानी लेखन ,कविता- पाठ, fancy ड्रेस ,एकलअभिनय आदि इवेंट थे जो एक ही मंच पर pरस्तुत किए गए । कार्यक्रम के संयोजक-संजय शाश्वत थे जिन्होंने कार्यक्रम से भोजपुर के जिलाधिकारी ,पुलिस अधीक्षक ,उप-विकास पधाधिकारी को कार्यकारिणी से जोड़ दिया.पटना ,गया,बक्सर,मुजफ्फरपुर,छपरा , मोतिहारी,भागलपुर,हाजीपुर,जहानाबाद,आदि जगहों से बच्चे भाग लिए।२० सितम्बर ०९ को विजय प्रकाश ,प्रधान सचिव ,ग्रामीण विकास विभाग ,बिहार सरकार ने जैन स्कूल ,आरा में बाल महोत्सव का उदघाटन किए.
Sunday, August 9, 2009
Wednesday, June 3, 2009
आरा रंगमंच पर लड़कियां -सुभान अल्लाह
आरा बिहार के कस्बाई शहरों में से एक है जहाँ सांस्कृतिक गतिविधियाँ हमेशा से बनी रही है। शिवपूजन सहाय ,मुशर्रफ आलम जौकी ,देवेन्द्र गौतम जैसे अनेक शायर इसी आरा शहर की देन हैं। जौकी साहब तथा गौतम जी तो आज भी अपनी कलम से लोगों तक शेरो-शायरी की खुशबू पहुचाते रहे हैं। वहीँ मीडिया जगत में सहारा टाईम्स के दिल्ली एडिशन के संपादक उदय शंकर हो या फ़िर ओंकारेश्वर पाण्डेय, देवेन्द्र गौतम, संजय शाश्वत या नई बाल पत्रिका आइना की संपादक स्वयम्बरा,लोकसभा चैनेल में प्रोड्यूसर प्रियम्बरा हो सभी आरा से ही सम्बंधित हैं। १८५७ में भारत की आजादी की पहली लडाई के हीरो बाबु कुंवर सिंह भी आरा से ही जुड़े हुए थे , भारत के प्रथम विपक्ष के नेता रामसुभग सिंह,जगजीवन बाबू जैसे लोग आरा की मिट्टी में जन्म लिए , मगर इसके बावजूद आरा पिछड़ा रहा।
यवनिका संस्था ने रंगकर्म के माध्यम से समाज की मानसिकता को सुधारने का बीड़ा उठाया । यवनिका के संस्थापक सदस्यों में स्वयम्बरा तथा प्रियम्बरा ने इस दिशा में जमकर काम किया। कहा जाता है की "जाके पैर न फाटे बेवाई , सो क्या जाने पीर पराई " आरा में काम करने के लिए इन बहनों ने नाटक के साथ क्लासिकल नृत्य, लोक नृत्य जैसे अनेक कार्यक्रमों में जमकर अपना रोल निभाया। ९०-९८ तक आरा ही नहीं अपितु समस्त भारतवर्ष में यवनिका का पताका फहराना शुरू हुआ । हर तरफ़ से पुरस्कारों का ढेर लग गया .औरत, टंकारा का गाना, मुख्यमंत्री , अंधेर नगरी, अंधायुग, बिदेसिया, बेटी बेचवा, कन्यादान, बेबी , बुधं शरणम गच्छामि, मुआवजे , मेरा नाम मथुरा है, अश्वथामा हतो नरो वा कुंजरो वा , जैसे नाटकों में अभिनय कर लड़कियों ने आरा रंगमंच का मान-सम्मान बढाया । महिला रंगकर्मियों में ----छंदा सेन,निरुपमा शन्कर, स्वय्म्बरा, प्रियम्बरा,अपर्णा वर्मा,श्वेता , दीपानिता राज, अन्नुश्री , सुजाता, काली माई आदि कलाकार अभी भी सक्रीय हैं । क्रमश:------
यवनिका संस्था ने रंगकर्म के माध्यम से समाज की मानसिकता को सुधारने का बीड़ा उठाया । यवनिका के संस्थापक सदस्यों में स्वयम्बरा तथा प्रियम्बरा ने इस दिशा में जमकर काम किया। कहा जाता है की "जाके पैर न फाटे बेवाई , सो क्या जाने पीर पराई " आरा में काम करने के लिए इन बहनों ने नाटक के साथ क्लासिकल नृत्य, लोक नृत्य जैसे अनेक कार्यक्रमों में जमकर अपना रोल निभाया। ९०-९८ तक आरा ही नहीं अपितु समस्त भारतवर्ष में यवनिका का पताका फहराना शुरू हुआ । हर तरफ़ से पुरस्कारों का ढेर लग गया .औरत, टंकारा का गाना, मुख्यमंत्री , अंधेर नगरी, अंधायुग, बिदेसिया, बेटी बेचवा, कन्यादान, बेबी , बुधं शरणम गच्छामि, मुआवजे , मेरा नाम मथुरा है, अश्वथामा हतो नरो वा कुंजरो वा , जैसे नाटकों में अभिनय कर लड़कियों ने आरा रंगमंच का मान-सम्मान बढाया । महिला रंगकर्मियों में ----छंदा सेन,निरुपमा शन्कर, स्वय्म्बरा, प्रियम्बरा,अपर्णा वर्मा,श्वेता , दीपानिता राज, अन्नुश्री , सुजाता, काली माई आदि कलाकार अभी भी सक्रीय हैं । क्रमश:------
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