आरा बिहार के कस्बाई शहरों में से एक है जहाँ सांस्कृतिक गतिविधियाँ हमेशा से बनी रही है। शिवपूजन सहाय ,मुशर्रफ आलम जौकी ,देवेन्द्र गौतम जैसे अनेक शायर इसी आरा शहर की देन हैं। जौकी साहब तथा गौतम जी तो आज भी अपनी कलम से लोगों तक शेरो-शायरी की खुशबू पहुचाते रहे हैं। वहीँ मीडिया जगत में सहारा टाईम्स के दिल्ली एडिशन के संपादक उदय शंकर हो या फ़िर ओंकारेश्वर पाण्डेय, देवेन्द्र गौतम, संजय शाश्वत या नई बाल पत्रिका आइना की संपादक स्वयम्बरा,लोकसभा चैनेल में प्रोड्यूसर प्रियम्बरा हो सभी आरा से ही सम्बंधित हैं। १८५७ में भारत की आजादी की पहली लडाई के हीरो बाबु कुंवर सिंह भी आरा से ही जुड़े हुए थे , भारत के प्रथम विपक्ष के नेता रामसुभग सिंह,जगजीवन बाबू जैसे लोग आरा की मिट्टी में जन्म लिए , मगर इसके बावजूद आरा पिछड़ा रहा।
यवनिका संस्था ने रंगकर्म के माध्यम से समाज की मानसिकता को सुधारने का बीड़ा उठाया । यवनिका के संस्थापक सदस्यों में स्वयम्बरा तथा प्रियम्बरा ने इस दिशा में जमकर काम किया। कहा जाता है की "जाके पैर न फाटे बेवाई , सो क्या जाने पीर पराई " आरा में काम करने के लिए इन बहनों ने नाटक के साथ क्लासिकल नृत्य, लोक नृत्य जैसे अनेक कार्यक्रमों में जमकर अपना रोल निभाया। ९०-९८ तक आरा ही नहीं अपितु समस्त भारतवर्ष में यवनिका का पताका फहराना शुरू हुआ । हर तरफ़ से पुरस्कारों का ढेर लग गया .औरत, टंकारा का गाना, मुख्यमंत्री , अंधेर नगरी, अंधायुग, बिदेसिया, बेटी बेचवा, कन्यादान, बेबी , बुधं शरणम गच्छामि, मुआवजे , मेरा नाम मथुरा है, अश्वथामा हतो नरो वा कुंजरो वा , जैसे नाटकों में अभिनय कर लड़कियों ने आरा रंगमंच का मान-सम्मान बढाया । महिला रंगकर्मियों में ----छंदा सेन,निरुपमा शन्कर, स्वय्म्बरा, प्रियम्बरा,अपर्णा वर्मा,श्वेता , दीपानिता राज, अन्नुश्री , सुजाता, काली माई आदि कलाकार अभी भी सक्रीय हैं । क्रमश:------
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बहुत अच्छी जानकारी दी आपने आरा के बारे में. हर क्षेत्र के लोग विक्सित हो रहे हैं और समाज के मूख्य धारा से जुड़ रहे हैं. बिहार का दल्मिअनगर जैसा औद्योगिक शहर पास में होते हुए भी विकास इन क्षेत्रो में कम ही हुआ है.
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